ठंड से परेशान विस्थापित, देख रहे पुनर्वास की राह

कड़ाके की ठंड के साथ ही गंडक नदी के कहर के बाद विस्थापित हुए परिवार के लोगों की समस्याएं बढ़ गयी हैं। पिछले कई माह से विस्थापित परिवारों के लोग पुनर्वास की राह देख रहे हैं। इनकी उम्मीदों पर सरकार व जिला प्रशासन खरा नहीं उतर सका है। हर बार बाढ़ आने पर कटाव पीड़ित परिवारों की याद शासन को आती तो जरुर है, लेकिन इसके साथ ही इनकी पीड़ा को प्रशासनिक स्तर पर भुला दिया जाता है। ऐसे में वर्षो से विस्थापन की राह देख रहे पीड़ित परिवारों के लोग इस उम्मीद में जी रहे हैं कि उन्हें सरकार पीड़ा से मुक्ति दिलाने की दिशा में कार्य करेगी।

आधिकारिक सूत्रों की मानें तो वर्ष 2001 में जिले में आयी भीषण बाढ़ में सैकड़ों परिवार पूरी तरह से तबाह हो गये थे। त्रासदी का आलम यह था कि सैकड़ों परिवारों के लोगों ने तटबंध व सरकारी जमीनों पर अपना आश्रय बनाया। आज भी इन परिवारों के लोग तटबंध व नहर की पटरियों पर झोंपड़ी बनाकर अपना व परिवार के लोगों का गुजारा कर रहे हैं। तब भीषण बाढ़ आने के समय बाढ़ व कटाव पीड़ितों को रहने के लिए तीन-तीन डिस्मील जमीन उपलब्ध कराने की घोषणा की गयी थी। आज इस घोषणा को तेरह साल बीतने के बाद भी कटाव पीड़ित तटबंध व नहर की पटरियों पर बस जी रहे हैं। उनकी सुध लेने की जरुरत ना ही सरकार ने समझी और ना ही जिला प्रशासन ने।

सेमरिया के लोगों को भी नहीं मिला मुआवजा

2011 में गंडक नदी के कटाव के कारण बरौली प्रखंड के सेमरिया व मुसहर टोली गावों में भारी तबाही मची। पूरे गांव के लोग विस्थापित हो गये। कटाव के बाद इन परिवारों के लोगों को मुआवजा देने की घोषणा की गयी थी। इस घोषणा के महीनों बाद भी पीड़ित परिवारों को मुआवजे की पूर्ण राशि का भुगतान नहीं हो सका है। स्थिति यह कि आज भी इन गांवों के लोग मुआवजा पाने की आस में जिला भू-अर्जन कार्यालय की दौड़ लगाने को विवश हो रहे हैं।

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