यहां शिक्षा के क्षेत्र में सुविधाएं तो बढ़ी, लेकिन इसकी रफ्तार काफी धीमी रही। सरकारी स्तर पर विद्यालयों के लिए भवन व भूमि उपलब्ध कराने की पहल के बाद भी ढाई सौ से अधिक स्कूलों को अपना भवन नसीब नहीं हुआ। ऐसे में इन स्कूलों को दूसरे विद्यालयों से टैग करने की मजबूरी बनी। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यहां करीब चार हजार बच्चे अब भी विद्यालयों में शिक्षा पाने नहीं जाते। अलावा इसके करीब साढ़े सात लाख की आबादी आज के समय में भी यहां निरक्षर है।
ऐसा भी नहीं कि जिले में शिक्षा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। शिक्षण संस्थान पिछले दशक के मुकाबले इस दशक में बेहतर हुए हैं। सरकारी विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति भी बढ़ी है। बावजूद इसके सरकारी विद्यालयों में जरुरत के हिसाब से संसाधन का विकास नहीं हो सका है। स्कूल से लेकर इंटर स्तर के कालेजों में वर्ग कक्ष की कमी आज भी समस्या है। हालत यह कि 21वीं सदी में भी जिले के प्रारंभिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को बैठने के लिए बेंच की सुविधा उपलब्ध नहीं करायी गयी है। जिले के 1288 प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को बैठने के लिए बोरा व चट्टी ही सहारा है। सरकारी स्कूलों के बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देने का दावा भी अबतक कोरे स्वप्न की ही तरह है।
सिर्फ नाम के लिए कंप्यूटर शिक्षा
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को कंप्यूटर आधारित शिक्षा देने की परिकल्पना की गई थी। इसके बाद भी अभी तक केवल नौ मध्य विद्यालयों में ही कंप्यूटर लग पाया। इन विद्यालयों में भी बिजली के अभाव में कंप्यूटर बंद पड़े हुए हैं और बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
कई बच्चों ने नहीं देखा स्कूल
सरकार तथा जिला प्रशासन के तमाम प्रयासों के बाद भी चार हजार बच्चे अब भी स्कूलों में पढ़ने के लिए नहीं जाते। हालांकि इस साल स्थिति में काफी सुधार भी हुआ है। आंकड़ों की मानें तो पांच साल पूर्व स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या 23 हजार से भी अधिक थी, लेकिन पांच साल के दौरान इनमें से 20,500 हजार बच्चों को विद्यालय लाया गया। ये आंकड़े सरकारी हैं। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार यहां करीब चार हजार बच्चों ने स्कूल का मुंह ही नहीं देखा है।
साढ़े सात लाख लोग निरक्षर
साक्षर भारत 2011 के तहत कराए गये सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि गोपालगंज जिले में साढ़े सात लाख लोग अब भी निरक्षर हैं। ये आंकड़े शिक्षा विभाग के लिए चौंकाने वाले हैं। निरक्षरता का प्रतिशत सबसे अधिक कुचायकोट प्रखंड में है। बावजूद इसके साक्षर भारत अभियान के तहत निरक्षर लोगों को साक्षर करने का अभियान भी तमाम प्रखंडों में जारी है।
योजनाओं ने बढ़ाया आकर्षण
सरकारी विद्यालयों में बच्चों को आकर्षित करने के लिए सरकार द्वारा संचालित साइकिल योजना, पोशाक योजना, प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों को पोशाक, मिड डे मिल, छात्रवृति योजना तथा विकलांग बच्चों के लिए ट्राई साइकिल की योजनाएं कारगर रहीं। इन्हीं योजनाओं के कारण स्कूलों में बच्चों की संख्या में भी इजाफा हुआ।