यहां नहीं होता मुख्य सचिव के आदेश का पालन

विभाग के निर्देशों के बाद भी मनरेगा योजनाओं की जांच की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में आ गयी है। मुख्य सचिव ने मनरेगा के कार्यो की जांच करने का आदेश दिया था। लेकिन इस निर्देशों के बाद भी महीनों से जिले में किसी भी पंचायत में मनरेगा की जांच की प्रक्रिया ठप होने से योजना के कार्यान्वयन पर भी सवाल उठने लगे हैं। योजनाओं की जांच ठप होने का नतीजा यह है कि हर साल मनरेगा की योजनाएं लंबित रहने का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि सूबे के प्रधान सचिव ने एक सितम्बर 2012 को सभी जिलाधिकारियों व उप उप विकास आयुक्त को पत्र लिखकर मनरेगा के तहत पंचायतों में संचालित विकास परक योजनाओं की जांच करने का निर्देश दिया था। प्रधान सचिव ने प्रत्येक बुधवार को हरेक पंचायत के कम-से-कम एक पंचायत की योजना की जांच का निर्देश दिया था। इस निर्देश के आलोक में जिले के सभी चौदह प्रखंडों में जांच के लिए वरीय उप समाहर्ता के स्तर के पदाधिकारियों को जांच दल में शामिल किया गया था। योजना के शुरुआत में इस कार्य में अपेक्षित तेजी देखी गयी। प्रत्येक बुधवार को जांच का कार्य किया भी गया। लेकिन करीब एक साल तक लगातार जांच के बाद योजनाओं की जांच की प्रक्रिया में गिरावट आने लगी। स्थिति यह रही कि करीब छह माह से इस योजना में जांच का कार्य ठप हो गया है। जांच ठप होने के बाद दोबारा गत वर्ष ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव ने पत्र लिखकर मनरेगा की जांच शुरु करने का निर्देश दिया। बावजूद इसके यहां मनरेगा जांच का अभियान बंद है। ऐसे में लंबित मनरेगा कार्यो की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है। आज स्थिति यह है कि जिले में पिछले छह साल से योजनाएं लगातार लंबित चल रही हैं।

हर साल फंस रही योजनाएं

पिछले छह साल के आंकड़ों पर गौर करें तो मनरेगा के तहत ली गयी योजनाएं हरेक साल फंसती चली जा रहीं हैं। योजनाएं फंसने का सबसे बड़ा कारण इनकी जांच की प्रक्रिया बंद रहना है। आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2009-10 में ली गयी कई योजनाएं आज भी लंबित हैं। इसी प्रकार वर्ष 2010-11 में 23, 2011-12 में 2218, 2012-13 में 501, 2013-14 में 582 तथा 2014-15 की 3259 योजनाएं भी लंबित हैं।

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