कहने को तो जिले के बीचोंबीच से होकर हाइवे गुजरती है। लेकिन यह हाइवे स्थानीय लोगों के लिए काफी खतरनाक साबित हो रही है। जिले की सीमा में स्थित 57 किलोमीटर की दूरी में हाइवे पर एक दर्जन से भी अधिक स्थानों पर डेथ प्वाइंट हैं। पूरे हाइवे पर ना ही कहीं रिफ्लैक्टर लगा है और ना ही ट्रैफिक सिग्नल। ऐसे में आये दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। बड़ी दुर्घटनाओं के बाद स्थिति में सुधार की बातें होती हैं। लेकिन बाद में इसे शासन भूल जाने को आदी हो चुका है।
दुर्घटनाओं के आंकड़े बताते हैं कि यहां कभी भी यातायात की व्यवस्था ही सटीक नहीं रही है। सड़कों पर फर्राटा भरते वाहनों के बीच हर दिन दुर्घटनाएं होती हैं। इस दुर्घटना में हर वर्ष दर्जनों लोगों की जान जाती है, दर्जनों लोग प्रति वर्ष दुर्घटना में घायल होकर अपंग हो जाते हैं। बावजूद इसके दुर्घटनाओं पर लगाम के लिए कोई बेहतर व्यवस्था नहीं है। आलम यह है कि प्रति वर्ष वाहनों की संख्या में तो वृद्धि हो रही है, लेकिन यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने की कवायद करीब शून्य है। जिला मुख्यालय सहित जिले के किसी भी शहरी इलाके में ट्रैफिक लाइट की व्यवस्था अबतक लागू नहीं हो सकी है। मुख्य चौक-चौराहों पर लोग अपने विवेक से सड़क पर इस पार से उस पार होते हैं। जिन चौक-चौराहों पर अधिक भीड़ होती है या उधर से वरीय पदाधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है, वहां होमगार्ड के जवान ट्रैफिक को नियंत्रित करते दिखते हैं। जिले में स्थित राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या 28 पर कहीं भी यातायात संकेतक नहीं है। कमोबेश यहीं स्थिति शहरी इलाकों में भी नजर आती है। स्कूल-कालेज, अस्पताल आदि के पास कुछ चिन्हित स्थानों को छोड़ अन्य स्थानों पर संकेतक इस जिले में देखने को नहीं मिलते हैं।