बच्चों के विकास के लिए अनिवार्य बने आठवीं घंटी

 बच्चों के लिए स्कूलों में आठवीं घंटी की जरुरत को लेकर जब अभियान प्रारंभ हुआ तो शुरुआती दौर में लोगों का उत्साह कम रहा। लेकिन अभियान आगे बढ़ने के साथ ही इससे लोग खुद-ब-खुद जुड़ते चले गये। लोग इस अभियान में सिर्फ जुड़े ही नहीं, बल्कि अपनी बातों को काफी बेहतर तरीके से तर्क के साथ प्रस्तुत किया। कुछ ने अपने बचपन की यादों को साझा किया तो किसी ने व्यवस्था पर चोट की। लेकिन सभी लोगों की बातों का सार यहीं रहा कि बच्चों के विकास के लिए स्कूलों में आठवीं घंटी अनिवार्य बने। साथ ही विशेष रूप से शहरी इलाके में पार्क व खेल के मैदान का विकास हो। ताकि बच्चे इसमें खेल सकें।

रविवार को मीडिया की ओर से आयोजित परिचर्चा कार्यक्रम में पहुंचे लोगों ने बच्चों के खेलने के लिए जगह के अभाव के बिन्दु पर अपनी बातों को बेहतर तरीके से रखा। परिचर्चा की शुरुआत इस बात से की गयी कि बच्चे खेलना तो चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है। चाहे वह स्कूल का कैंपस हो अथवा मोहल्ले की व्यवस्था। ऐसे में बच्चे चाहकर भी खेलने की हसरत पूरी नहीं कर पाते। परिचर्चा के प्रारंभ में लोगों ने अपनी बातों को तर्क के साथ रखा। सरकारी स्कूलों में वर्तमान समय में खेल का माहौल समाप्त होने से लेकर पूर्व की व्यवस्था आदि पर अपना पक्ष रखा। कई लोगों ने तो सरकारी विद्यालयों के भवन निर्माण कार्य में मानक का पालन तक नहीं किये जाने की बात कही। तो कुछ ने कहा कि निर्माण कार्य के दौरान स्कूलों में खेल मैदान की दरकार को अभियंता से लेकर अधिकारी तक मानों भूल चुके हैं। यहीं कारण है कि सरकारी स्कूलों में आठवीं घंटी की व्यवस्था करीब-करीब समाप्त हो चुकी है। हाई स्कूलों में कुछ स्थानों पर खेल के मैदान उपलब्ध भी हैं तो वहां शारीरिक शिक्षकों की कमी है। ऐसे में बच्चे स्कूली जीवन में ही खेल जैसी बुनियादी जरुरत से महरूम रह जाते हैं। इस व्यवस्था में सुधार के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ ही आम लोगों व समाज को एकजुट होना पड़ेगा। ताकि बच्चों को उनके विकास के लिए हम खेल का मैदान व खेल के माहौल को लौटा सकें। रविवार को आयोजित परिचर्चा में ब्रजेश चन्द्र मिश्र, अनिल कुमार श्रीवास्तव, रामाशंकर कुंवर, नवी अहमद उर्फ बाबू भाई, मुन्ना राज, ज्योति प्रकाश बरनवाल, तारकेश्वर प्रसाद, इंजीनियर विमल कुमार, शशि बी गुप्ता, चन्द्रभूषण सिंह, रुक्मिणी देवी, रमेश कुमार मिश्र, आदित्य शंकर शादी, परशुराम श्रीवास्तव, संजीव कुमार पिंकी, सूर्यकांत मिश्रा तथा प्रशांत कुमार सिंह सहित कई लोग शामिल हुए।

स्कूलों की व्यवस्था में हो सुधार

परिचर्चा में पहुंचे समाजसेवी चन्द्रभूषण सिंह ने कहा कि आज स्कूलों की व्यवस्था में खेल का कहीं भी स्थान नहीं दिखता। ऐसे में बच्चे छात्र जीवन में ही खेल जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित रह जा रहे हैं। खेल के अभाव में छात्र-छात्राओं का मानसिक विकास नहीं हो पाता है। वे कहते हैं कि आज की चिकित्सा पद्धति भी यह मानती है कि बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास में खेल का काफी महत्व है। खेल से बच्चों का शारीरिक विकास होता है। लेकिन हमारी व्यवस्था आज खेल की सुविधा को ही भूल चली है। स्कूलों से धीरे-धीरे खेल के मैदान गायब हो गये हैं। विद्यालयों को प्राथमिक से मध्य तथा मध्य विद्यालय से हाई स्कूल तो बनाया जा रहा है। लेकिन उस हिसाब से सुविधाएं नहीं दी जा रही है। शिक्षा विभाग के आंकड़ों को ही देखे तो जिले के किसी भी सरकारी स्कूल के लिए पिछले दो दशक में और जमीन की व्यवस्था नहीं की गयी। हां भवन का निर्माण जरुर कर दिया गया। जब खेल के मैदान में भवन निर्माण होगा तो बच्चे खेलेंगे कहां? इस व्यवस्था पर नए सिरे से विचार की जरुरत है। अन्यथा बच्चे खेल के बगैर कुंठित हो जाएंगे।

शहर में बने पार्क, तो हो विकास

नगर परिषद की पूर्व चेयरमैन रुक्मिणी देवी भी परिचर्चा के दौरान इस बात पर सहमत दिखीं कि खेल का माहौल आज स्कूल से लेकर शहरी क्षेत्र के मोहल्ले तक में गुम हो गया है। वे कहती हैं कि स्कूलों में खेल की घंटी गायब होना ही इसका कारण नहीं है। अगर स्कूलों में जगह का अभाव है तो हम मोहल्ले में बच्चों को वह सुविधा प्रदान कर सकते हैं। इसके लिए समाज को एकजुट होना होगा। और व्यवस्था का संचालन करने वालों को इसके लिए प्रेरित करना होगा। साथ ही शहरी इलाकों में व्यवस्था की बागडोर संभालने वालों को भी इस दिशा में कार्रवाई करनी होगी। परिचर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि आज जिला मुख्यालय में एक भी पार्क नहीं है। जबकि शहरी इलाके की आबादी एक लाख के करीब पहुंच चुकी है। वे बोलीं शहरी इलाके में पार्क की सुविधा उपलब्ध कराना जरुरी है। ताकि बच्चे खेल सकें और उनका संपूर्ण विकास हो। इस दिशा में मोहल्लों में समितियों का गठन कर कार्य किया जा सकता है।

प्रयास हो, कि लौट जाए बच्चों का बचपन

परिचर्चा में पहुंचे अधिवक्ता रमेश कुमार मिश्र बचपन की कड़ियों को जोड़ते हुए कहते हैं कि जब हम छोटे थे तो स्कूल से लेकर गांव तक खेलने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध थी। यह बात अलग थी कि तब आज के समय के अनुसार खेल के संसाधन नहीं थे। बावजूद इसके बच्चे खेल से खुश थे। तब कबड्डी, बालीबाल व फुटबाल खेले जाते थे। जमाना आधुनिक हुआ तो स्कूलों से लेकर शहरी इलाके तक में जगह समाप्त होते गये, और गलियां खेल का मैदान बन गयी। लेकिन अब इस बात की जरुरत है कि हमारी व्यवस्था तथा हमारा समाज बच्चों को उनका बचपन लौटा दे। वे कहते हैं कि बच्चों का बचपन तभी लौट सकता है जब बच्चे पढ़ाई के साथ खेल-कूद सकें। इससे उनके खेल क्षमता का भी आकलन होगा और उनका शारीरिक व मानसिक विकास भी। इसके लिए बस थोड़ी सी प्रयास की दरकार है।

दोषारोपण नहीं, काम की है दरकार

समाजसेवी आदित्य शंकर शाही ने परिचर्चा के दौरान स्कूलों में खेल की घंटी बंद होने को लेकर वक्ताओं द्वारा दोषारोपण किये जाने पर ही सवाल खड़ा किया। वे बोले यह स्थित चंद दिनों में पैदा नहीं हुई है। अगर आज स्कूलों से खेल की घंटी गायब हुई है तो उसमें सुधार के दिशा में कार्य किया जाना चाहिए। जो हो चुका है, उसमें सिर्फ सुधार कर ही पूर्व की स्थिति को कायम किया जा सकता है। इसके लिए सभी को मिलजुल कर कार्य करना होगा। सरकार को भी बच्चों में खेल के विकास के साथ ही उनकी क्षमता के विकास के लिए मैदान देने की जरुरत है। परिचर्चा में वे इस बात पर सहमत दिखे कि खेल छात्र जीवन का एक जरुरी हिस्सा है। बच्चों में खेल की भावना स्कूल के साथ ही अपने मोहल्ले में पैदा होती है। इसके लिए पार्क व खेल मैदान की जरुरत एक समान है। ताकि बच्चे अपनी रूचि के हिसाब से खेल को चुन सकें और अपनी क्षमता का संपूर्ण विकास कर सकें। इसके लिए बस हर क्षेत्र के लोगों को सार्थक प्रयास की जरुरत है। चाहे वह व्यक्ति शिक्षा विभाग का अधिकारी हो या नगरीय क्षेत्र का जनप्रतिनिधि।

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